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भारतीय संस्कृति में राष्ट्रधर्म और विधान का राज्य


भारतीय संस्कृति में सामाजिक व्यवस्था का संचालन सरकारी कानून से नहीं बल्कि प्रचलित नियमों जिसे ‘धर्म’ के नाम से जाना जाता था, के द्वारा होता था। धर्म ही वह आधार था जो समाज को संयुक्त एवं एक करता था तथा विभिन्न वर्गों में सामंजस्य एवं एकता के लिए कर्त्तव्य-संहिता का निर्धारण करता था।
राष्ट्रधर्म के बारे में प्रचलित शास्त्रोक्त कहावत् -‘ जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी’’ के अंर्तगत जननी और जन्मभूमि को स्वर्ग से भी बढकर बताया गया है। मातृभूमि को स्वाधीन रखने का ऋग्वेद   में स्पष्ट आहव्ान है- यतेमहि स्वराज्ये। भारतवर्ष में ऋग्वेद  में ‘गणांना त्वां गणपति ’ आया है। गण और जन ऋग्वेद  में हैं। महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म से आदर्श गणतंत्र कीे परिभाषा पूछी । भीष्म ने (शातिपर्व 107.14) बताया कि भेदभाव से गण नष्ट होते हैं।अथर्ववेद (6.64.2) में समानो मंत्रः समितिः  - - समानं चेतो अभिसंविशध्वम्।। मनुष्यों के विचार तथा सभा सबके लिए समान हो कहा गया है। एक विचार एवं सबको समान मौलिक शक्ति मिलने की बात कही है। विधान के राज्य या धर्मराज्य की  संक्षिप्त परिभाषा भी यही  है।  गण के लिए आंतरिक संकट बड़ा होता है- आभ्यंतर रक्ष्यमसा बाह्यतो भयम् , बाह्य उतना बड़ा नहीं। गणतंत्र के मूल शब्द गण की अवधारणा अर्थशास्त्र के रचयिता कौटिल्य और आचार्य पाणिनी  के जमाने में भी वर्णित है। उस काल में समाज के प्रतिनिधियों के दलों को गण कहा जाता था और यही मिलकर सभा और समितियां बनाते थे।
किसी ऐसे काल्पिनिक छोटी शासन  व्यवस्था में भी, सभी फैसले बहुसंख्यक वोट से हो, ऐसा संभव नहीं । जनता का शासन तभी संभव है जब बहुसंख्यक समाज अपने मत द्वारा ऐसा विधान बनाए जिसका पालन प्रत्येक व्यक्ति के उपर, पुलिस और न्यायालय द्वारा कराया जाए। अलोकतांत्रिक तानाशाह अपने मर्जी को संविधान और कानून द्वारा जनता पर थोप सकते हैं। जो समाज राष्ट्रों के निर्माण के पूर्व किसी प्राकृतिक नियम या मर्यादा को तरजीह देती हैं और मानवाधिकारों के प्रति संवेदनशील है वे विधान के द्वारा निर्मित राज्य का सर्मथन करती हैं।एक निरंकुश तानाशाह कानून के नियमों से लैस होकर मानवाधिकारों की अवहेलना करता है। । किसी श्रेष्ठ कानून की संरचना के लिए विधि के विधान की आवश्यकता होती है। विधान के राज्य के बिना स्थिर बडे़ लोकतांत्रिक सरकार की कल्पना नहीं की जा सकती। स्थायित्व और निरन्तरता की खूबियॉं और राष्ट्र को अक्षुण रखने की चाह के कारण ही  विधान के राज्य को भेदभाव फैलाने वाले राजनेताओं के शासन पर प्रथमिकता मिलती है। गलती से या जानबूझकर कोई भी व्यक्ति नियंत्रण के अभाव में कानून का अनुपालन नहीं करना चाहता है। इसी प्रकार शासनाध्यक्ष या सांसद संविधान  को अंगीकृत और आत्मार्पित करने की शपथ लेने के बावजूद, अपने स्वार्थवश या राजनैतिक कारणों से उसका गलत अर्थ निकालते हैं या  उसकी अवहेलना करते हैं।
 विधि का विधान सरकारों में वैद्यता स्थापित कर स्थिरता लाती है। मानवाधिकार, व्यक्तिगत स्वतंत्रता और प्रजातंत्र ये तीन मुख्य कारण/उद्देश्य हैं जिसके लिए जनता शासकों के शासन को सहन एवं सहयोग करती है। एक सरकार जो विधि बनाने में विधान के नियमों को नजरअंदाज करती है, वह न केवल इन तीन मूल्यों में कटौती करती है बल्कि अपने अस्तित्व के लिए भी खतरा उत्पन्न करती है। जब विधान राज्य करता है तो कोई विशिष्ट आज्ञा दायित्व निर्वाहन के बीच नहीं आती। क्यूकिं हमे जनता की चिंता है इसलिए हम विधान के नियमों को प्रभावी तरीके से लागू और कार्यान्वित होते देखना चाहते हैं। कानून और कर्तव्य का रिश्ता यहॉं उत्तरदायित्व का होता है।
 समान्य परिभाषा में विधान राज्य या धर्मराज्य एक ऐसा तंत्र  है जहॉं कानून जनता में सर्वमान्य हो; जिसका अभिप्राय( अर्थ ) स्पष्ट हो; तथा सभी व्यक्तियों पर समान रुप से लागू हो। ये राजनैतिक और नागरिक स्वतंत्रता को आदर्श मानते हुए उसका समर्थन करते है, जिससे कि मानवाधिकार की रक्षा में विश्व में अहम् भूमिका निभाई गई है। विधान के राज्य एवं उदार प्रजातंत्र में अतिगम्भीर सम्बन्ध है। विधान का राज्य व्यक्तिगत अधिकार एवं स्वतत्रंता को बल देता है, जो प्रजातांत्रिक सरकार का आधार है। सरकारें विधान के राज्य की श्रेष्ठता स्वीकार करते हुए जनता के अधिकारों के प्रति सचेत रहती हैं, वहीं एक संविधान ,जनता में कानून की स्वीकृति पर निर्भर करता है। विधि एवं विधान के राज्य में कुछ खास अन्तर हैं- जो सरकारें प्राकृतिक नियम  , मर्यादा, व्यवहार विधि को आर्दश मानते हुए, किसी प्रकार के पक्षपात नहीं करती तथा न्याय के संस्थानों को प्राथमिकता देती हैं ,वे विधान द्वारा स्थापित होती हैं। दीनदयालजी द्वारा रचित जनसंघ के
राष्ट्र जीवन-दर्शन के  छठे सूत्र (जो आज भारतीय जनता पार्टी का भी राष्ट्र जीवन-दर्शन है ) में आदर्श राष्ट्र के रूप में धर्मराज्य, एक असम्प्रदायिक राज्य या विधान का राज्य को स्वीकार किया है।

भारतवर्ष के स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष में स्वदेशी विचारधारा, राष्ट्र के संस्कृतिक गौरव और उसकी भावना की अहम् भुमिका रही है। स्वाधीनता का अर्थ राष्ट्रपिता के निगाह में राष्ट्र के समाजिक जीवन जो प्रशासनिक व्यवस्था, आर्थिक विकास और तत्कालीन धार्मिक झुकाव को दर्शाता है, सभी को हिन्दूस्तानी विचारों और जीवन के सर्वांगीण विकास से सुशोभित करना था।  इंग्लैण्ड मे पढ़े और दक्षिण और दक्षिण अफ्रीका में कानून तथा राजनीति में कार्यरत्त राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी ने राष्ट्र के स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष आम आवाम का परिधान स्वदेशी धोती केा अपनाया। गाँधीजी   का देहान्त 30 जनवरी 1948 को हुआ। संविधान पर विचार - विमर्स 5 नवम्बर 1948 से शुरू हुआ । 26 जनवरी 1950 को उसका भारतीय गणराज्य के रूप में लागु कर दिया गया।
किसी राष्ट्र के जीवन में देखने के लिए एक वातायन होता है साहित्य, जो उस राष्ट्र के धर्म, कला, संस्कृति और मानवीय मूल्यो का  भी सर्जक होता है। संविधान का स्थान इसमें प्रथम है।संविधान केवल एक लिखीत दस्तावेज नहीं वह राष्ट्र के सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक लक्ष्यों का मार्गदर्शक भी होता है।स्वदेशी आंदोलन से मिली स्वतंत्रता  के  बाद निर्मित भारतीय संविधान के ज्यादातर तत्व विदेशी स्त्रोतों से है। बहुत कम ही बातें हैं जो भारतीय संस्कृतिक मूल्यों पर आधारित हैं जिसे संविधान में शामिल किया गया है । जबकि यह एक ऐतिहासिक सच्चाई है, विश्व की सबसे पुरानी गणराज्य बिहार के लिच्छवी( वैशाली) में कार्यरत थी। संविधान की संरचना के ढॉंचे का अधिकतर अंश औपनिवेशिक दासता के दिनों में पारित, भारत सरकार अधिनियम 1935 से बना है, जिसे दुर्भाग्यवश निरन्तरता और स्थिरता के आधार पर अपनाना जरूरी समझा गया। संविधान का भाग 3 में अंकित दार्शनिक भाग जो मौलिक अधिकारों से संबधित है का कुछ भाग, संघात्मक शासन प्रणाली, न्यायपालिका , अमेरिकन संविधान से शामिल किया गया है। भाग 4 में अंकित राज्य के नीति निर्देशक तत्व आयरलैंड से, 4अ मे वर्णित मूल कर्त्तव्य सोवियत संघ से , राजनैतिक भाग जिसमे विधायिका और कार्यपालिका के संबन्ध और मंत्रीमंडल के उत्तरदायित्व, प्रक्रिया एवं विशेषाधिकार हैं ब्रिटेन से,गणतंत्रात्मक शासन व्यवस्था फ्रांस से, संघ और राज्यो का शक्तिविभाजन कनाडा से, जर्मनी से आपात उपबंध ,औस्ट्रेलिया से समवर्ती सूची। इन सबके बावजुद ब्रिटेन, यूरोपीय संघ तथा अन्य राष्ट्र मे मौजूद विधान के राज्य के सिद्धान्त भारतीय संविधान में पुर्ण रुप से लागू नहीं हैं , इसमें समता का सिद्धान्त प्रमुख है। कार्यपालिका और नौकरशाह के अधिकार आम जनता से अधिक हैं।
कहने को तो हम गणतंत्र है, पर इस गणतंत्र से गण गायब है , जनतंत्र से जन गायब है तथा तंत्र की तानाशाही है। जन और गण की भूमिका केवल मत देने तक रह गयी आज भी भारतीय गणराज्य की सफलता भारतीय एकता और संप्रभुता के समक्ष चुनौतियां अपनी जटिलता के साथ पूरी तरह मौजूद है। भारतीय गणतंत्र को भारत के अंदरूनी शक्तियों ने ही खोखला किया है।कानुन व्यवस्था रस्म आदायगी ही रह गयी है। 
न्यायपालिका जो संविधान की जिम्मेवार संरक्षक है, के न्यायालयों में लम्बित लाखों मुकदमों में ’न्याय में देरी के कारण अन्याय है।’ आज की राजनीतिक सोच विभिन्न क्षेत्रों, जातियों ,वर्गो को अलग पहचान की ओर ले जा रही है। मजहबी तथा क्षेत्रीय अलगावाद देशतोड़क हैं तो भी तुष्टीकरण और वोटबैंक की रणनीति के तहत सेकुलर हैं। समान नागरिक सहिता राष्ट्र के नीति निर्देशक संवैधानिक तत्व हैं।जम्मू कश्मीर विषयक संवैधानिक सुधार अनुसूची 370 अस्थाई था, लेकिन स्थाई है । अलकायदा , लश्कर-ए-तैयबा और आईएसआई आदि विदेशी आंतकवादियों का घुसपैठ आज भी जारी है, जबकि सर्वोच्च न्यायालय ने इसे राष्ट्र  के विरूद्ध युद्ध बताया है। असम, अरूणाचल, मेघालय, मिजोरम, मणिपुर, त्रिपुरा, नगालैण्ड़, सिक्किम पर चीन अपनी काक दृष्टि लगाए हुए है।अरूणाचल को तो वह अपने राष्ट्र का हिस्सा ही मानता है।  इसपर चीनी रणनीतिकार झान लुई का स्वप्न -भारत को 25-30 भागों में करने का है। आज भी इन पूर्वोत्तर राज्यों में स्वतंत्रता या गणतंत्र दिवस जनता के बीच नहीं मनाई जाती। अल्पसंख्यकवाद राष्ट्रीय एकता के लिए घातक है पर वोटबैक र्है । जो राजनीतिक दल राज्यों में भाषा ,जाति और क्षेत्र का लगाकर बने हैं वे अखिल भारतीय सोच कहॉं से लाएगें।
कश्मीर के कल्हण राजतंरगिणी में भारत की सनातन सस्कृति का इतिहास है। धर्मातरण के शताब्दियों बाद वही समाज आज स्वायत्तता के राष्ट्र विरोधी बात कर रहा है, यह स्वायत्तता  जम्मू , लद्दाख को नहीं चाहिए। इससे तो मजहबी संगठन के तर्क,  कि धर्मातरण राष्ट्रातरण है को ही बल मिलता है । आजादी के बाद तथाकथित राजनेता ने मुसलमान समाज को जोड़ने का नहीं मजहबी खौफ दिखाकर तोड़ने और वोटबैंक बनाने का काम किया है। जो आज स्वायत्तता की बात करते हैं वह कल का अलगावादी है। कश्मीरी संगठन हुर्रियत और पूर्वोत्तर राज्यों के उल्फा का इस मामले में समान एजेड़ा है। आज सोवियत यूनियन का हश्र हमारे सामने है, जहॉं राजनीतिक महत्वाकांक्षा कि लड़ाई में राष्ट्र को ही खंडित कर दिया गया। आर्थिक तंगी झेल रहे सोवियत यूनियन को सुधारवादी र्गोबाच्योव के मानवीय मूल्यों पर आधारित व्यवस्था देना प्रारंभ किया , लेकिन येल्तसिन के रुस के राष्ट्रपति बनने और र्गोबाच्योव के नीचा देखने कि लालसा ने सोवियत यूनियन को ही विभाजित कर दिया।
अल्पसंख्यकवाद, आरक्षणवाद ,क्षेत्रवाद, जातिवाद और साम्प्रदायिकतावाद के कारण उत्पन्न भेदभाव से गण नष्ट हो रहे हैं।
संविधान के निर्माता भी सांस्कृतिक क्षमता से परिचित थे । 221 पन्नों के संविधान के कुल 22 भाग थे, तथा इसके हस्तलिखीत प्रति में भारतीय संस्कृति के प्रतिक राष्ट्रभाव वाले 23 चित्र थे। मुखपृष्ठ पर राम और कृष्ण तथा भाग एक में सिन्धु घाटी सभ्यता की स्मृति अंकित थी। नागरिकता के मैलिक अधिकार वाले पृष्ट पर श्री राम की लंका विजय, राज्य के नीति निर्देशक तत्वों वाले पन्ने पर कृष्ण अर्जुन उपदेश वाले चित्र थे। वास्तव मे यह भारतीय संस्कृति के विकास का इतिहास है। अपने आखिरी भाषण में डा॰ अम्बेड़कर ने प्राचीन भारतीय परंपरा की याद दिलाते हुए कहा था - एक समय था जब भारत गणराज्यों से सुसज्जित था यह बात नहीं कि भारत पहले संसदीय प्रकिया से अपरिचित था। यहॉं वैदिक काल से ही एक परिपूर्ण गणव्यवस्था थी।
हिन्दु समाज प्राचीन काल से ही अपनी प्रजा या समाज को शिक्षित करना अपना मौलिक कर्तव्य समझती थी। यही वह आधार था जिसपर ‘हिन्दु संस्कृति’ स्थापित थी। शिक्षा का अर्थ मनुष्य की आन्तरिक, रचनात्मक मानसिक विकास और आत्मिक इच्छापूर्ति के लिए उपयुक्त प्रणाली नियम, विधि और व्यवस्था विकसित करना था। शिक्षा को संविधान में उचित स्थान नहीं दिया गया और इसे मौलिक अधिकारों में भी  नहीं शामिल किया गया। ऋग और अथर्ववेद एवं महाभारत में राज्यों और गणराज्यों के सिद्धान्तों को संविधान में यथोचीत स्थान नहीं मिला है।
आधुनिक भारत में विधान के राज्य के अभाव में महत्वपूर्ण आर्थिक एवं गैर आर्थिक संस्थानों यथा - निगम, बैंक, श्रम संगठनों , कर प्रणाली, प्रबन्धक संस्थायें में अपारदर्शिता, अक्षमता और स्वार्थपरक शक्तियॉं सर उठाने लगी हैं। जिसके फलस्वरूप लोकतंत्र के चारों स्तंम्भों - विधायिका ,न्यायपालिका, कार्यपालिका, मीडिया भी खोखली होती जा रही हैं।
 जाति, मजहब, राजनीति और क्षेत्रीय आग्रह समाज को तोड़ते हैं संस्कृति ही इन्हें जोड़ती है। महाभारत में धर्मराज युधिष्ठिर ने भीष्म को जो उपदेश गणतंत्र के बारे में दिया था उस उपदेश  को आज के राजनेताओं को गंभीरता से लेते हुए राष्ट्र की एकता और अखंड़ता सुनिश्चित करने के लिए विधान के राज्य के सिद्धान्तों को पूणरूपेण लागु कर देना चाहिए । एक नई  व्यवस्था और कानून जो भारतीय संस्कृति पर निर्मित हो, विधान का राज्य, स्वतंत्रता, मानवाधिकार, लोकतांत्रिक मूल्यों से सुसज्जित हो आज के भारत की आवश्यकता है।

समाचार पत्र आज मे 11 फ़रवरी 2010 को प्रकाशित दीनदयाल उपाध्याय के पुण्यतिथि पर विशेष करके मेरा यह आलेख छापा था.

बाली एक संस्मरण

                 बाली एक संस्मरण
जब हम लोग 21 जनवरी 2017 की रात 12:50 बजे कलकत्ता हवाई अड्डे से एयर एशिया की फ्लाइट संख्या AK-376  से बाली, इंडोनेशिया देश के एक टापू की ओर रवाना हुए थे तो हम सभी ने यह कल्पना भी नहीं की थी की हमारी यात्रा इतनी रोमांचक और मजेदार होगी . बाली इंडोनेशिया देश का एक प्रांत है जिसकी राजधानी डेनपासर है .इसका क्षेत्रफल 5,780  वर्ग किलोमीटर है . 2014 मे इसकी जनसंख्या 4,225,384 थी और यह  भूमध्य रेखा से 8 डिग्री - 39’  दक्षिण और 115 डिग्री – 13’ पूर्व  में औस्ट्रेलिया के निकट स्थित एक द्वीप  है जिसे हिन्दुत्व का द्वीप , शांति द्वीप  या देवताओं का द्वीप के नाम से भी जाना जाता है . यहाँ  83.5% हिन्दू 13.4% मुस्लिम  2.5% ईसाई और 0.5 %  बौद्ध आस्था के लोगों का निवास है और यहाँ  के निवासी मूलतः बाली प्रजाति (90%) के हैं . जावा (7%)  यहाँ दूसरी सबसे बड़ी प्रजाति है . इंडोनेशिया विश्व का सबसे बड़ा इस्लामिक देश ( और द्वीपीय देश भी ) है,  जहां मुसलमान समुदाय  बहुसंख्यक है और हिन्दु आबादी वहाँ अल्पसंख्यक है , सिर्फ बाली ही इस देश का  ऐसा द्वीप  है जहां हिन्दु समुदाय बहुसंख्यक  है . आबादी की दृष्टि से यह विश्व का चौथा सबसे बड़ा देश है .
 हम 11 लोगों का समूह जब लगभग 4 घंटे की उड़ान के बाद , बाली जाने के क्रम में  मलेशिया की राजधानी कुआला लूमपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर उतरा,  तो वहाँ के विमानतल की सुंदरता  और सफाई ने हमें मंत्रमुग्ध कर दिया. लगभग 3½  घंटे बाद वहाँ से हमें बाली की हवाई उड़ान मिलने वाली थी और हमारे भारतीय समय के अनुसार रात के 3 बज कर 50 मिनट बज रहा था, जबकि मलेशिया के समय अनुसार वहाँ सुबह के 7:20 मिनट बज रहा था .हवाई अड्डे पर कुछ दुकाने ही खुली हुई थी जो मूलतः खाने-पीने का समान बेच रहे थे . हम लोगों ने वहाँ कौफ़ी पी तथा बच्चों ने कुछ अल्पाहार लिया.  हवाई पटल पर नजर गई तो  इंडोनेशिया की  राष्ट्रीय विमान सेवा की हवाई जहाज “गरुड” पर निगाह पड़ी, विदेशी हवाई जहाज का देशी नाम सुनकर आश्चर्य हुआ परंतु बहुत अच्छा भी लगा. एक इस्लामिक देश जहाँ हिन्दु अल्पसंख्यक हैं वहाँ लोगों ने विमान का यह हिन्दु प्रचलित नामकरण किया है, भारत में होता तो सारे राजनैतिक दल इसे सांप्रदायिकता का नाम देकर हल्ला मचाते.
कुआला लूमपुर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे से हम सभी बाली के लिए विमान पकड़कर 2 1/2 घंटे के सफर के बाद बाली द्वीप के डेनपासर अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर पहुंचे. बाली पहुंचने से पहले समुद्री सीमाओं से दोनों तरफ घीरे इस द्वीप का नज़ारा विमान से अद्भुत दिखा रहा था . एक तरफ जहाँ हिन्द महासागर तो दूसरी ओर प्रशांत महासागर से घीरा यह टापू उड़ान भर रहे विमान से  देखने से निराला लग  रहा था.  बाली का  हवाई अड्डा भी अत्यंत खूबसूरत, साफ और फूल – पौधों से सुसज्जित था. पूरे बाली प्रदेश मे सड़कें खूबसूरत और हरियाली से युक्त थी , सफाई और पर्यावरण का पूरा ध्यान द्वीप पर दिखा .हमारे लिए होटल की गाड़ी खड़ी थी , हमने उसे ओंबक लौट वीला, जो बाली के दक्षिण पश्चिम में केमागी समुद्र तट पर स्थित था चलने को कहा. गाड़ी मे उपस्थित गाइड ने हमे बताया कि आज यहाँ विद्या की देवी सरस्वती की पूजा है इसलिए त्योहार का वातावरण है. जानकर अत्यंत प्रसन्नता और उत्सुकता हुई, हमने फिर उस गाइड से वहाँ के सभ्यता और कौलेंडर के बारे मे प्रश्नों की झड़ी लगा दी .
जानकारी मिली की यहाँ बाली द्वीप का अलग कौलेंडर है, जो यहाँ के पुरोहित और ज्योतिष मिल कर निकालते हैं . यहाँ के समय के अनुसार हिंदुस्तान से 2½ घंटे पहले यहाँ सूर्योदय होता है जिसके कारण उनका चंद्र दिवस भी इसलिए हिंदुस्तान से अलग है, इसलिए यह असमानता है . यहाँ के हिन्दू अपने को बालिनीज़ हिन्दू  के नाम से अपनी पहचान बताते हैं . प्राचीन काल में बाली मे नौ हिन्दू पंथ निवास करते थे पशुपति , भैरवा , शिव-सिद्धांता, वैष्णव, बौद्ध,  रेसी , शोरा और  गणपत्य. हर पंथ के अलग-अलग देव और निजी पुरोहित होता है . बाली की संस्कृति में हिन्दू, चीन विशेष कर भारतीय संस्कृति का विशेष प्रभाव दिखा, इसकी शुरुआत प्रथम ईस्वी से हो गई थी. इस द्वीप पर कई मंदिर हैं , तथा सभी पंथ के अलग-अलग मंदिर हैं जिसमे सिर्फ उसी पंथ के लोगों के प्रवेश की अनुमति मिलती है . ऐसे कम ही मंदिर हैं जहाँ सभी हिंदुओं को दर्शन और पुजा करने की अनुमति है . यहाँ के प्रसिद्ध  मंदिरों मे पूरा बेसकिह ( जिसे मंदिरों की माता भी कहा जाता है ) , तनाह लॉट, उलूवाटू मंदिर , उलून डाणु बेरातन  मंदिर आदि प्रसिद्ध हैं. बाली की संस्कृति मे वहाँ के नृत्य का विशेष  महत्व है. बाली में वहाँ के नृत्य और संगीत सुनने का अवसर मिला . बाली की नृत्य शैली वहाँ के धर्म से जुड़ा है और भारत के दक्षिणी प्रदेश की  विशेष कर भरतनाट्यम नृत्य शैली का प्रभाव दिखा . यह बाली के स्थानीय शैली के साथ मिलकर एक विशेष प्रकार की भाव- भंगिमा, अभिनय युक्त नृत्य शैली का विकास हुआ है . हालांकि भारतवर्ष के नृत्य शैली में भाव – भंगिमा ज्यादा है और ऐसा मानना है कि भारतवर्ष से जावा द्वीप को इस नृत्य के संचारण के क्रम में कहीं विलुप्त हो गई है. बाली निवासी अपने नृत्य में हिन्दु  देवी दुर्गा, उमा, पार्वती और महाभारत और रामायण के कुछ कृतियों का भी प्रदर्शन करते हैं. वाद्य यंत्रों मे बाँसुरी, ड्रम, घंटियाँ और ढोलक इत्यादि का मिश्रण होता है . यहाँ के समुद्री तटों मे सेमीण्यक, कुटा और लेगीयन प्रमुख हैं. बाली के अधिकतर समुद्री तट पर काली ज्वालामुखी की रेत पायी जाती है , पर्ंतु सेमीण्यक तट अत्यंत सुंदर है और वहाँ की रेत उजली सुनहरी है.
     बाली का उबुद इलाका हतकरघा और हस्तशिल्प कला के लिए मशहूर है , विशेष कर चाँदी और सोने के जेवरात ,  ज्वालामुखी पत्थर की विशाल हिन्दु देवी देवताओं की मूर्तियां और लकड़ी से बने समान के लिए . यहाँ हर ग्राम में एक विशेष प्रकार की हस्तकला विकाशित है. यहाँ की बनी चाँदी के जेवरात की कारीगरी पूरे विश्व मे प्रसिद्ध है और विश्व के कई प्रसिद्ध स्वर्णकारों ने यहाँ अपनी कार्यशाला बना रखा है . बाली की पहाड़ी खेतों की कृषि पद्धति में वहाँ की प्राचीन सिचाई प्रणाली और उस पर निर्भर शानदार धान की फसल बहुत उत्तम और विकसित है और भारत के कुछ प्रदेशों के लिए यह सिचाई प्रणाली अनुकरणीय है.
  हम सभी लोगों ने इस यात्रा का भरपूर मजा लिया और खूब आनंद किया . मन मे इस अनोखे निराले द्वीप का चित्र बसाये हम सभी 26 जनवरी को वहाँ से अपने देश के लिए रवाना हुए . छः दिनों की बाली यात्रा यहाँ की संस्कृति व सभ्यता को समझने के लिए बहुत कम है, और ऐसा लगता है कि इस प्राचीन सभ्यता को समझने के लिए कम से कम एक महीना की यात्रा होनी चाहिए थी .         .                     

Article on Freedom of Speech , Nationalism and Treason in Hindi

अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता, देशद्रोह और राष्ट्रवाद


राष्ट्र समान्यतः राज्य या देश से समझा जाता है,जो सरहद ,सीमाओं से बंधा भूमि का खण्ड हो. राष्ट्र का एक शाश्वत अथवा जीवंत अर्थ है “ एक राज्य में बसने वाले समस्त जन समूह जो एक समान संस्कृति से बंधे हों ”. राष्ट्रवाद की तात्कालिक युग में यही शाश्वत अर्थ है  इसका सजग  उदाहरण इज़राइल है जो यहूदियोंबंजारों का एक ऐसा समूह था जिसकेपास पहले कोई जमीन भी नहीं था.
 अगर जन राष्ट्र का भौगोलिक तन (शरीर) है, तो संस्कृति इसकी आत्मा है जो लोगों को जोड़े रखता है इनमें एकता और सामंजस्य बनाये रखता है यही वह धुर है जिस पर राष्ट्र  का सर्वागीण विकास आधारित है .  एक संगठित समाज / राष्ट्र ही सामर्थवान होता है जहाँ समाज की शक्ति सार्थक दिशा में राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में एक जुट होती है .इसके बिना राष्ट्र का विकास अधुरा रह जाता है .                राष्ट्रवाद राष्ट्र हितों के प्रति समर्पित विचार है , जो एकता, महत्ता और कल्याण का समर्थक है , समस्त भारतीय समुदाय को समता एवं समानता के सिद्धान्तों पर एकीकरण करने का एक सतत् प्रयास है . राष्ट्रवाद समस्त नागरिकों के प्रति समर्पित विचार है , जिसमें सवर्ण, दलित , पिछड़े, हिन्दू मुस्लिम , सिख, ईसाई सब सम्मालित हैं .नागरिकों को एकता के सूत्र में बॉधने एवं एक दूसरे के प्रति  सच्ची श्रद्धा – समर्पण ही राष्ट्रवाद है .                राष्ट्रवाद का सीधा संबंध विकास से है, जो किसी राष्ट्र के अंतिम व्यक्ति के विकास से परिलक्षित होता है . विश्व के आठ बड़े विकसित देशों के समूह जी– 8 का विचार करें, तो इसमें दो ऐसी आर्थिक शक्तियाँ हैं , जिनको भारतवर्ष के साथ ही लगभग स्वतन्त्रता मिली तानाशाहों से  जापान और जर्मनी ये दो देश द्वितीय विश्वयुद्ध मे बुरी तरह तबाह हो गए थे. काम करने वाले स्वस्थ लोग काम ही बचे थे , आर्थिक एवं राजनैतिक दबाव से ग्रसित थे तथा कर्ज के बोझ से दबे हुए थे . इन राष्ट्रो मे एक समानता थी , इन प्रदेशों की जनता मे राष्ट्रवाद की भावना कूट –कूट कर भरी हुई थी .  आज ये देश विकसित हैं .सरकारी  राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण मे यह स्पष्ट वर्णन है की हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है . 1995 के अपने एक आदेश से माननीय उच्चतम न्यायालय ने हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म को भारत वासियों की जीवन जीने की शैली के रूप मे परिभाषित किया है . हिन्दुत्व ने सदियों से मुसलमानों, ईसाईयों और हिन्दुओं में एकता कायम की है और रहीम, कबीर, रामदास और महात्मा गाँधी इत्यादि कई संतों और मौलवियों ने इसी धारा पर काम कर राष्ट्र को एकता और सद् –भावना के सूत्र मे बांधा है .अगर हम भारतीय मूल के हिन्दू ,मुसलमान और ईसाईयों की संस्कृति की बात करें तो धार्मिक रीति-रिवाजों को छोड़ इन सारे खुशी के मौकों पर साथ  को छोड़ कर साथ- साथ रहते-रहते प्रायः  सबने एक दूसरे के बहुत सारे  रीति रिवाज , सभ्यता , कार्य – संस्कृति  और तौर तरीकों  को ग्रहण किया है तथा उसे अपने व्यवहार और जीवनशैली मे सम्मलित किया . यह इन सभी धर्मो मे समान है जो की अन्य देशों की संस्कृति से बिल्कुल भिन्न है . वास्तव मे यही धर्मनिरपेक्ष हिन्दू समाज की सभ्यता की तस्वीर है और इसे देश विदेश में  हिन्दुत्व या हिंदुस्तानी सभ्यता या संस्कृति के नाम से जाना जाता है . यही कारण है की भारतीय मुला के मुसलमान और ईसाई सम्प्रदाय अपने को अन्य देशो के भाइयों से अपने को बिल्कुल अलग और भिन्न पाते हैं .
 आज देश में कुछ तथाकथित प्रगतिशील बंधुओ का, जिनको राष्ट्रीय हित से ज्यादा अपने बुद्धिजीवी कहलाने का अहंकार है, कुछ ऐसे विभाजक सांप्रदायिक , अराष्ट्रीय सोचवाली संस्थाओं पर आधिपत्य है.  जो देश के सभी बौद्धिक संस्थाओं पर अपनी सोच थोपना , वे अपना अधिकार समझते हैं . कभी पुरस्कार लौटा कर तो कभी जवाहरलाल नेहरू एवं हैदराबाद केन्द्रीय विश्व विद्यालय के नाम देश को गुमराह करते हुए  भारत को नीचा एवं संसार मे बदनाम करने का प्रयास कर रहें हैं .
भारतीय संविधान  की उद्देशिका (प्रस्तावना)  जो इसका आधारभूत स्तम्भ है, संविधान को नियंत्रित करता है, और यह संसद द्वारा नहीं बनाया गया है .  संविधान की प्रस्तावना को अत्याधिक ध्यान  देकर और  विवेचना के साथ तैयार किया गया था , जिससे  की यह  संविधान निर्माताओं के उच्च विचारों और महान उद्देश्य को प्रतिबिम्बित करे . इसके प्रस्तावना के चार आधारभूत स्तम्भ हैं :-सामाजिक , आर्थिक और राजनीतिक न्याय, स्वतन्त्रता-  विचार , अभिव्यक्ति , विश्वास , धर्म और आराधना की , समता – प्रतिष्ठा और अवसर का , बंधुता – व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली . इसके प्रति सभी नागरिक , संकल्पित होकर भारत को एक सम्पूर्ण प्रभूत्ता –सम्पन्न , समाजवादी ,पंथनिरपेक्ष, लोकतान्त्रिक गणराज्य बनाने के लिए इस संविधान को अंगीकृत कर , अधिनियमित और आत्मर्पित करते हैं.
भारतीय संविधान के अध्याय 3 के अनुच्छेद 19 (1)(ए) अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता प्रदान करता है , परंतु यह निर्वाध नहीं है . देश की सुरक्षा ,मित्र राष्ट्रों के संबंध एवं भारत की संप्रभुता एवं अखंडता इत्यादि विषयों के साथ- साथ लोक भावनाओं का भी ध्यान रखने का भी  यह निर्देश देता है .

      जे.एन.यू में 9 फरवरी 2016  की  घटी घटना जिसमे सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर संसद पर हमले के मास्टरमाइंड अफजल गुरु को महिमामंडित कर भारतीय न्यायिक प्रणाली और व्यवस्था को कठघरे मे खड़ा करने का असफल प्रयास किया गया था  . 8 फरवरी को  जेएनयू के छात्रों के एक छोटे समूह ने रात्री भोजन के पश्चात् परिसर में पोस्टर चिपकाए  तथा  9 फरवरी को आतंकी अफजल गुरु और मकबूल भट्ट को याद करते हुए “ शहादत दिवस “ मनाया . 9 फरवरी को सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर देशविरोधी  , भारत को बर्बाद और देश को टुकड़े करने के राष्ट्र विरोधी नारे लगाए गए.
      इसी प्रकार हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के शोधार्थी रोहित वेमुला का दुःखद आत्महत्या को कुछ राजनीतिक दलों और उनके कुछ पक्षधर मीडिया के लोगों  ने सस्ती लोकप्रियता  और अपनी टी.आर.पी. की भूख मिटाने के लिए राष्ट्रवादी और हिन्दू संस्थाओं को बदनाम करने मे विशेष रुचि ली.  जबकि सच्चाई  यह है की  मुंबई कांड जिसमे सैकड़ों निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई थी,  के जवाबदेह याक़ूब मेनन को सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय के आधार पर हुई, और फांसी वाले दिन प्रतिबंधित नक्सली संगठन आई.एस.ए की ए.सी.यू की शाखा ने याक़ूब के सम्मान मे ‘नमाज़े ए जनाजे ’ का आयोजन किया था . याक़ूब के फांसी के खिलाफ ओ.यू. और एच.सी.यू. में कुछ छात्रों ने उग्र प्रदर्शन करते हुए देश विरोधी नारे लगाए --. "याक़ूब तुम्हारे खून से क्रांति आएगी , कितने याक़ूब मारोगे हर घर मे याक़ूब निकलेगा". राष्ट्रवादी छात्रों ने इसका विरोध किया तो उन्हे पीटा गया. राष्ट्र विरोधी कारणों से  विश्वविद्यालय नें कुछ छात्रों को उसके छात्रावास से निलंबित क़तर दिया, जिसमे रोहित वेमुला भी शामिल था.  उसे हिंसक गतिविधियो में लिप्त पाया गया था. आत्महत्या के पूर्व लिखे पत्र के अंश जिसे साजिश के तहत पत्र मे काटा गया था , इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि छात्रावास से निलंबन से ज्यादा वह नक्सली संगठन  ए.एस.ए और एस.एफ.आई. की कार्यप्रणाली से व्यथित था.

जरा सोचिए यह  सब राष्ट्रद्रोह नहीं तो और क्या है ? क्या अभिव्यक्ति के नाम पर मुठ्ठी भर तथा कथित लोगों को देश , समाज और राष्ट्र को तोड़ने  की छूट दी जा सकती है . आज गैर –भारतीयता को सेकुलरवाद और राजनीतिक सफलता का पैमाना माना जाता है . यहाँ राष्ट्रीयता की विचारधारा को हलके ढंग से लेते हुए हिंदुत्वमूलक सामाजिक और सांस्कृतिक विचारधारा जो वास्तव में भारतीय सनातनी परिकल्पना का आधार है , को ही संदेह की दृष्टी से देखा जाता है .  आज हम सभी नागरिकों एवं जनप्रतिनिधियों का यह नैतिक ,सामाजिक एवं मौलिक कर्त्तव्य है कि हम आपसी भेदभाव को भुलाकर भारतवर्ष में राष्ट्रप्रेम और राष्ट्रभक्ति जागृत करने का सामूहिक प्रयास करें .





Some important RSS Contribution to the nation in Hindi

अतुलनीय योगदान जो आरएसएस ने देश हित में किए.


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जो एक हिंदूवादी संगठन है ,इसकी स्थापना 1925 में आदरणीय डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने की थी l आरएसएस शायद दुनिया का इकलौता संगठन है जो खुद के लिए सांप्रदायिक,देश तोड़ने वाले आदि इत्यादि आलोचनात्मक शब्द सुनकर भी डटकर खड़ा है और काम कर रहा है l हालांकि लोग इस संगठन को कुछ भी आरोप देते रहें लेकिन वो सारे हर बार ही निराधार साबित हुए है l

आज हम आपको संघ के ऐसे ही 10 कार्यों से अवगत कराने जा रहे है जो इस संगठन ने देश हित में लिए और वो बहुत ही कारगार सिद्ध हुए l

1. कश्मीर सीमा पर निगरानी, विभाजन पीड़ितों को आश्रय

ये संघ ही था और इसके स्वयंसेवक थे जो अक्टूबर 1947 से ही कश्मीर सीमा पर पडोसी मुल्क पाकिस्तान की सेना की हर एक गतिविधि पर बिना किसी प्रशिक्षण के लगातार नज़र रख रहे थे l यह काम न तत्कालीन भारत सरकार कर रही थी, और न ही कश्मीर की राजा हरिसिंह की सरकारl उसी समय, जब पाकिस्तानी सेना की टुकड़ियों ने कश्मीर में घुसना चाहा तो भारतीय सैनिकों के साथ कई स्वयंसेवकों ने भी अपनी मातृभूमि की रक्षार्थ प्राण दिए l विभाजन के बाद जब दंगे भड़के तो नेहरू सरकार पूरी तरह परेशान थी, संघ ने पाकिस्तान से जान बचाकर आए शरणार्थियों के लिए 3000 से ज़्यादा राहत शिविर लगाए थे

2- 1962 का युद्ध

इस युद्ध में हिस्सा लेकर मात्रभूमि की रक्षार्थ और सेना की मदद के लिए देश के कोने कोने से संघ के स्वयंसेवक जिस जोश के साथ सीमा पर पहुंचे, उसका गवाह पूरा हिंदुस्तान था lइन स्वयंसेवकों ने सरकारी कार्यों में और खास तौर पर सेना के जवानों की सहायता में पूरा जोर लगा दिया l स्वयंसेवकों के योगदान का हिसाब आप इस बात से लगा सकते है कि जवाहर लाल नेहरू को 1963 में 26 जनवरी की परेड में संघ को शामिल होने का निमंत्रण देना पड़ाl  परेड करने वालों को आज भी महीनों तैयारी करनी होती है, लेकिन मात्र दो दिन पहले मिले निमंत्रण पर 3500 स्वयंसेवक गणवेश में उपस्थित हो गएl हालाँकि निमंत्रण दिए जाने पर नेहरु की जमकर आलोचना हुई किन्तु नेहरू ने कहा- “यह दर्शाने के लिए कि केवल लाठी के बल पर भी सफलतापूर्वक बम और चीनी सशस्त्र बलों से लड़ा सकता है, विशेष रूप से 1963 के गणतंत्र दिवस परेड में भाग लेने के लिए आरएसएस को आकस्मिक आमंत्रित किया गयाl ”

3-कश्मीर का विलय

ये वो दौर था जब स्वतंत्र रियासत कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ये फ़ैसला नहीं कर पा रहे थे कि कश्मीर का विलय आखिर कहाँ हो और दूसरी तरफ पाकिस्तानी सेना सीमा में घुसती ही जा रही थीl और ऐसे में नेहरु सरकार हाँथ पर हाँथ धरे बैठे हुए थी l ऐसे समय में सरदार बल्लभभाई पटेल ने गुरु गोलवलकर से सहायता मांगी l
सरदार के निवेदन पर गोलवरकर श्रीनगर पहुंचे और वहां जाकर महाराजा हारी सिंह से मुलाक़ात की l  इसके बाद महाराजा ने कश्मीर के भारत में विलय पत्र का प्रस्ताव दिल्ली भेज दियाl

4-1965 के युद्ध में क़ानून-व्यवस्था संभाली

ऐसा नही है कि कश्मीर विलय के समय सिर्फ पटेल को ही संघ याद आया हो बल्कि जब पाकिस्तान से युद्ध हो रहा था तो ऐसे समय में तत्कालीन प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री को भी संघ की याद आगयी थी l शास्त्री जी ने संघ के स्वयंसेवको से क़ानून-व्यवस्था की स्थिति संभालने में सहायता देने और दिल्ली का यातायात नियंत्रण अपने जिम्मे लेने का निवेदन किया, जिससे कि इन कामों से मुक्त किए गए पुलिसकर्मियों को सेना की मदद के लिए भेजा जा सके l घायल जवानों के लिए सबसे पहले रक्तदान देने वाले भी संघ के स्वयंसेवक ही थेl  युद्ध के समय कश्मीर की हवाईपट्टियों से बर्फ़ हटाने का काम संघ के स्वयंसेवकों ने किया थाl

5-गोवा का विलय

भारत में दादरा, नगर हवेली और गोवा का विलय कराने में आरएसएस ने निर्णायक भूमिका अदा की थीl वो तारीख 21 जुलाई 1954 थी जब दादरा को पुर्तगालियों से मुक्त कराया गया, 28 जुलाई को नरोली और फिपारिया मुक्त कराए गए और फिर राजधानी सिलवासा मुक्त कराई गईl संघ के स्वयंसेवकों ने 2 अगस्त 1954 की भोर पुतर्गाल का झंडा उतारकर भारत का तिरंगा लहरा दिया l पूरा दादरा नगर हवेली पुर्तगालियों के कब्जे से मुक्त करा कर आरएसएस ने भारत सरकार को सौंप दियाl संघ के स्वयंसेवक 1955 से गोवा को मुक्त कराने के लिए जोर शोर से सक्रीय हो गये l  गोवा में सशस्त्र हस्तक्षेप करने से नेहरू सरकार ने मना कर दिया lसरकार का ऐसा रवैया देखकर जगन्नाथ राव जोशी के नेतृत्व में संघ के कार्यकर्ताओं ने गोवा पहुंच कर आंदोलन आरम्भ कर दिया l इस आन्दोलन का नतीजा ये हुआ कि जगन्नाथ राव जोशी सहित संघ के कई कार्यकर्ताओं को दस वर्ष की सजा सुनाई गयी l  हालत जब काबू से बहार हो गये तब मजबूरन भारत को सैनिक हस्तक्षेप करना पड़ा और 1961 में गोवा आज़ाद हुआl

6-आपातकाल

1975 से 1977 के मध्य का दौर आपातकाल का दौर था जो बड़ा ही कठिन दौर साबित हुआ था l इस आपातकाल के विरुद्ध संघर्ष और जनता पार्टी के गठन तक में आरएसएस की भूमिका की याद अब भी कई लोगों के लिए जीवान्त होगी l सत्याग्रह में हजारों स्वयंसेवकों की गिरफ्तारी हुई l इस गिरफ्तारी के उपरान्त संघ के स्वयंसेवकों ने भूमिगत रह कर आंदोलन चलाना आरम्भ कर दिया l  आपातकाल के खिलाफ पोस्टर सड़कों पर चिपकाना, जनता को सूचनाएं देना और जेलों में बंद विभिन्न राजनीतिक कार्यकर्ताओं –नेताओं के बीच संवाद सूत्र का काम इन्ही संघ कार्यकर्ताओं ने किया l  जब लगभग सारे ही नेता जेलों में बंद थे, तब सारे दलों का विलय करा कर जनता पार्टी का गठन करवाने की कोशिशें संघ की ही मदद से संभव हो सकी थी l

7-भारतीय मज़दूर संघ

1955 में अस्तित्व में आया भारतीय मज़दूर संघ विश्व का इकलौता ऐसा मज़दूर आंदोलन था,जो विध्वंस के बजाए निर्माण की विचारधारा लिए आगे आया था l कारखानों में विश्वकर्मा जयंती का चलन भारतीय मज़दूर संघ ने ही आरम्भ कराया थाl आज यह विश्व का सबसे बड़ा, शांतिपूर्ण और रचनात्मक मज़दूर संगठन हैl

8-ज़मींदारी प्रथा का ख़ात्मा

राजस्थान,ऐसी जगह जहां एक बहुत बड़ी तादात ज़मींदारों की हुआ करती थी, उस राजस्थान में ख़ुद सीपीएम को यह कहना पड़ा था कि संघ के स्वयंसेवक भैरों सिंह शेखावत राजस्थान में प्रगतिशील शक्तियों के नेता हैंl शेखावत बाद में भारत के उपराष्ट्रपति भी चुने गये l
भारतीय विद्यार्थी परिषद, शिक्षा भारती, एकल विद्यालय, स्वदेशी जागरण मंच, विद्या भारती, वनवासी कल्याण आश्रम, मुस्लिम राष्ट्रीय मंच की स्थापना. विद्या भारती आज 20 हजार से ज्यादा स्कूल चलाता है, लगभग दो दर्जन शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेज, डेढ़ दर्जन कॉलेज, 10 से ज्यादा रोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थाएं चलाता है. केन्द्र और राज्य सरकारों से मान्यता प्राप्त इन सरस्वती शिशु मंदिरों में लगभग 30 लाख छात्र-छात्राएं पढ़ते हैं और 1 लाख से अधिक शिक्षक पढ़ाते हैं. संख्या बल से भी बड़ी बात है कि ये संस्थाएं भारतीय संस्कारों को शिक्षा के साथ जोड़े रखती हैंl

9-सेवा कार्य

चाहे वो 1971 में ओडिशा में आया भयंकर चंक्रवात हो या फिर भोपाल की गैस त्रासदी, चाहे फिर वो 1984 में हुए सिख विरोधी दंगों हो या गुजरात का भूकंप, सुनामी की प्रलय, उत्तराखंड की बाढ़ और कारगिल युद्ध के घायलों की सेवा हर एक विपदा में संघ ने राहत और बचाव का काम हमेशा सबसे आगे होकर किया हैl न सिर्फ भारत में बल्कि नेपाल, श्रीलंका और सुमात्रा तक में जाकर संघ ने राहत कार्य को अंजाम दिया है l

पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का राजनैतिक जीवनदर्शन


पण्डित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म २५ सितम्बर १९१६ को मथुरा जिले के छोटे से नगला चन्द्रभान गाँव में हुआ था. उपाध्यायजी नितान्त सरल और सौम्य स्वभाव के व्यक्ति थे.                                                                
महान चिन्तक और संगठनकर्ता पंडितजी भारतीय जनसंघ के संगठन मंत्री थे . विलक्षण बुद्धि , सरल व्यक्तित्व एवं नेतृत्व के अनगिनत गुणों के स्वामी भारतीय राजनीतिक क्षितिज के इस प्रकाशमान सूर्य ने भारतवर्ष में समतामूलक राजनीतिक विचारधारा का प्रचार एवं प्रोत्साहन करते हुए सिर्फ ५२ साल क उम्र में अपने प्राण राष्ट्र को समर्पित कर दिए . अनाकर्षक व्यक्तित्व के स्वामी दीनदयालजी  उच्च-कोटी के दार्शनिक थे किसी प्रकार का भौतिक माया – मोह उन्हें छु तक नहीं सका .
जनसंघ के राष्ट्रजीवन दर्शन के निर्माता दीनदयालजी का उद्देश्य स्वतंत्रता की पुर्नरचना के प्रयासों के लिए विशुद्ध भारतीय तत्व-दृष्टी प्रदान करना था . उन्होंने भारत की सनातन विचारधारा को युगानुकूल रूप में प्रस्तुत करते हुए देश को एकात्म मानववाद जैसी प्रगतिशील विचारधारा दी.
   दीनदयालजी को जनसंघ के आर्थिक नीति के रचनाकार बताया जाता है . आर्थिक विकास का मुख्य उद्देश्य समान्य मानव का सुख है या उनका विचार था . विचार –स्वातंत्रय के इस युग में मानव कल्याण के लिए अनेक विचारधारा को पनपने का अवसर मिला है . इसमें साम्यवाद, पूंजीवाद , अन्त्योदय, सर्वोदय आदि मुख्य हैं . किन्तु चराचर जगत को सन्तुलित , स्वस्थ व सुंदर बनाकर मनुष्य मात्र पूर्णता की ओर ले जा सकने वाला एकमात्र प्रक्रम सनातन धर्म द्वारा प्रतिपादित जीवन – विज्ञान, जीवन –कला व जीवन–दर्शन है.
संस्कृतिनिष्ठा दीनदयाल जी के द्वारा निर्मित  राजनैतिक जीवनदर्शन  का पहला सुत्र है उनके शब्दों में-  “ भारत में रहनेवाला और इसके प्रति ममत्व की भावना रखने वाला मानव समूह एक जन हैं . उनकी जीवन प्रणाली ,कला , साहित्य , दर्शन सब भारतीय संस्कृति है . इसलिए भारतीय राष्ट्रवाद का आधार यह संस्कृति है . इस संस्कृतिमें निष्ठा रहे तभी भारत एकात्म रहेगा .”
“वसुधैव कुटुम्बकम”  हमारी सभ्यता से प्रचलित है . इसी के अनुसार भारत में सभी धर्मो,जातियों, अगड़ों , पिछड़ों , दलितों  को समान अधिकार प्राप्त हैं . संस्कृति से किसी व्यक्ति ,वर्ग , राष्ट्र आदि की वे बातें जो उनके मन,रुचि, आचार, विचार, कला-कौशल और सभ्यता का सूचक होता है पर विचार होता है .  दो शब्दों में कहें तो यह जीवन जीने की शैली है . भारतीय सरकारी राज्य पत्र (गज़ट) इतिहास व संस्कृति संस्करण मे यह स्पष्ट वर्णन है की हिन्दुत्व और हिंदूइज़्म एक ही शब्द हैं तथा यह भारत के संस्कृति और सभ्यता का सूचक है .
मैं अपनी श्रद्धा सुमन इस महान आत्मा को समर्पित करता हूँ .